शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

दिल्ली, सपनों वाली दिल्ली

दिल्ली एक ऐसा बड़ा शहर है, जहाँ हर व्यक्ति आने के सपने देखता है। लेकिन सब नहीं आ पाते हैं। हमारे देश में जैसे विदेश घूम आए लोगों की एक अलग पहचान बन जाती है, ठीक उसी तरह ही दिल्ली,मुंबई जैसे बड़े शहरों से अगर कोई व्यक्ति घूम कर या फिर यूं कह सकते हैं कि रह कर जाता है, तो वो अपने आप को अलग समझने लगता है। की अजी हम तो शहर घूम कर आए हैं..!! उसकी एक अलग पहचान बन जाती है और लोग भी थोड़ा अलग नजर से देखने लगते हैं। ऐसा गांवों मे अक्सर होता है क्योंकि वहाँ पे कुछ एक ही होते हैं, जिन्होने शहर देखा है। वरना गाँव वालों की दुनियाँ तो बस अपने घर या आस-पास के गांवों-कस्बों तक ही सिमट कर रह जाती है। शहर तो उनके लिए सिर्फ सपना ही होता है, जिसे वो सिर्फ टेलीविज़न या फिर रेडियो पर ही देख सुन कर संतोष कर लेते हैं। 

मेरी भी कहानी कुछ ऐसी ही है। बचपन में कभी मैंने सोचा नहीं था की मैं कभी दिल्ली शहर भी जाऊँगी और मैं भी दिल्ली की एतिहासिक चीजें टेलीविज़न पर ही देख लिया करती थी। पर कहते है न की कभी-कभी सपने भी सच होते हैं वैसे मेरा भी सच हो गया और मेरी शादी दिल्ली में ही हुयी। जहाँ मैं मेरे परिवार और मेरे पति के साथ रहने लगी।

यहाँ आकर मेरा अनुभव, मेरी सोच से थोड़ा अलग रहा क्योंकि मैं यहाँ एक बेटी की तरह नहीं बल्कि एक बहू के रूप मे थी, जिसके लिए काफी पाबन्दियाँ होती है। वैसे मेरा परिवार तो इस मामले मे थोड़ा अलग है, जहाँ मुझे थोड़ी आज़ादी है। पर फिर भी कहते हैं न कि ससुराल मे बहू बेटी की तरह भले रहे पर वो ससुराल वालों के लिए बेटी नहीं होती है। और ये बात कहीं-न-कहीं दिख जाती है, जहाँ पर ससुराल में वो बहू ही साबित हो जाती है। ससुराल में एक बहू बेटी की तरह तब तक रह सकती है, जब तक वो बिना किसी सवाल-जवाब के ससुराल वालों की हाँ में हाँ मिलाए। उनके मन से चले बिना किसी गलती के। वरना कोई कमी ना होते हुये भी ससुराल मे बहू की हजार कमियाँ निकल आती हैं। जिसे अगर बहू ने मानने से इंकार कर दिया तो उसके लिए ठीक नहीं। खैर, ये तो मैं अपने मन की बात बता रही थी क्योंकि मैंने कई जगह ऐसा देखा है। पर मेरा परिवार तो इन सब मामलों से थोड़ा दूर है। 

शादी के बाद मैं जिन जगहों को टेलीविज़न मे देखती थी, वहाँ मैं घूमने गयी। वैसे तो दिल्ली मे घूमने के लिए इतनी जगहें हैं की हम इतनी आसानी से पूरी दिल्ली नहीं घूम सकते हैं। लेकिन कुछ जगहें जैसे लालकिला, राजघाट, कुतुबमीनार, लोटस मंदिर, इंडिया गेट, संसद भवन जैसी ऐतिहासिक जगहों पर अगर हम घूम ले तो ये कह सकते हैं कि हमने दिल्ली घूम ली। मैं भी इन जगहों पर घूमने गयी। पापाजी ने गाड़ी किराए पर ली और हम पूरे परिवार के साथ घूमने निकल पड़े। बहुत मजा आया था घूमते हुये और हमारा मन तो खुशी से झूम रहा था की जिन चीजों को देखने की कभी कल्पना भी नहीं की थी वो सारी जगहें हम घूम रहें है। और खाते-पीते मस्ती करती हुये हम सब इन्दिरा गांधी स्मृति भवन पहुंचे। वहाँ पर हमें ऐसी-ऐसी चीजें देखने को मिली, जिससे मेरा मन काँप उठा और बहुत दुख हुआ। वहाँ पर मैंने इंदिरा गांधी जी के वो कपड़े देखें जो उन्होने अपने ज़िंदगी के अंतिम दिन में पहन रखा था और राजीव गांधी जी के फटे-चीथड़े कपड़े जो उन्होने उस समय पहन रखे थे, जब उन्हे बम से उड़ा दिया गया था।

हमें तो तब से पहले पता भी नहीं था कि भले ही वो आज हमारे बीच नहीं है पर उनकी यादें आज भी हमारे साथ हैं, जो कभी भी किसी के दिल से नहीं मिटेंगी। वहाँ से निकलकर हम सब कतुबमीनार पहुंचे वहाँ भी हमनें वो सारी चीजे देखी जो मैनें किताबों में पढ़ी थीं आैर भी बहुत  नयी-नयी जानकारी मिली। वहाँ से घूमकर हम लालकिले के लिये निकले। वहाँ भी बहुत सी एेतिहासिक चीजे देखनें को मिली। लाल किले का मीना बाजार मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने वहाँ से अपने आैर अपनी बहन के लिये एक सुंदर-सा पर्स लिया। और और भाभी के बच्चों के लिये खिलौने और पेन खरीदा। उसके बाद चांदनी चौक में गोलगपपे, आइसक्रीम और हल्दीराम की रसमलाई व समोसे खाये। उस दिन हम सब इतना घूमें की घर आकर बस यही मन में था कि बस जल्दी से सो जायें।

पर फिर भी घूमने से थकान भले हो पर मजा खूब आता है। यह बिलकुल शादी के लड्डू की तरह होता है जो खाये वो पछताये जो ना खाये वो और भी ज्यादा पछताये। फ़िर एक दिन हम लोगों ने लालकिले का लाइट और साउण्ड शो देखा। वहाँ पर उसकी प्रस्तुति इतनी अच्छी की गयी थी की लग रहा था जैसे वो एक नाटक नहीं बल्कि सच में हो रहा है। वो घोड़ों के दौड़ने की आवाज, महल में नाच-गानें एकदम असली लग रहे थे। ऐसी बहुत-सी यादें हैं, जिसे मैंने अपने दिल मे बसा लिया है। जैसे कि दिल्ली मेरे दिल मे बस गयी है। कहने को तो बहुत सी बातें है पर कुछ बातें अपने तक ही रखना ज्याद सही रहता है, आगे जिससे हम एक बार फिर अपनी बातें आप तक पहुचा पाएँ कुछ नएपन के साथ। वैसे भी अभी कहने का ढंग भी सीख रही हूँ। आते-आते आ जाएगा।

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