आज
दस साल बाद यहाँ वापस लौटना हुआ । समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूँ । वैसे तो मैं भूल
ही चुकी थी कि मेरा ऐसा कोई ब्लॉग भी है । बस दो दिन पहले ऐसे बातों-बातों में याद आया कि मैं भी कभी लिखती थी ।
कितना
वक़्त आँखों के सामने से बीत गया । जिसमें लौटा नहीं जा सकता । मैं लौटना भी नहीं चाहती
। आप चाहकर भी लौट नहीं सकते । वह समय, सारा का सारा अब याद भी नहीं । कौन याद करे ।
इस गिनती में 2020 का साल न आया होता, तब ऐसा नहीं होता, जैसा यह हो गया है ।
आज कल जो मैं सबसे ज्यादा कर रही हूँ, वो है मोबाइल चलाना । वैसे मोबाइल तो कहीं नहीं आता जाता मेरे हाथ में ही रहता है । लेकिन मेरी आंखें बस मोबाइल के स्क्रीन पे चलती ही रहती है, जिसे कहते हैं मोबाइल की लत । आजकल मैं इतना फोन चलाती हूँ कि मेरी आँखें पूरी दर्द होने लगी है आंखें मींचती रहती और फोन देखती रहती ।
ये
इन्स्टाग्राम ने तो सबसे ज्यादा दिमाग खराब कर रखा है । दो मिनट के लिए मोबाइल
खोलो तो दो घंटे कब खत्म हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता । बस हाथ सिर्फ खिसकाते जाओ और नए -नए कंटेन्ट मिलते
जाते हैं । कभी-कभी ये सोचती हूँ कि जो मैं अपनी ज़िंदगी का इतना महत्वपूर्ण समय इस
सोशल-मीडिया को दे रही हूँ, बदले में वो मुझे क्या दे रहा है
? तब मेरा दिमाग कहता है कुछ नहीं । फिर भी मैं देखना नहीं
छोड़ पाती । लेकिन ऐसा क्यों हैं ? पता नहीं शायद यही लत है । आपको पता होता है, तब भी आप कुछ करने की हैसियत में नहीं होते
।
ये
सोशल-मीडिया ने हम सब के दिमाग खराब कर रखें हैं । चाहे वो रील देखने वाले हो या
रील बनाने वाले, आपको देखने वालों
में भी हर उम्र के लोग मिल जाएंगे और बनाने वालों में भी । हर कोई चाहे फोन करना, गूगल सर्च करना जानता हो या ना जानता हो
लेकिन ‘इन्स्टाग्राम’ और ‘यू-ट्यूब’ चलना तो जानता ही है । इसमें यह प्लेटफॉर्म भी तो मदद करने में लगे हैं ।
क्योंकि क्या देखना है ये टाइप करना नहीं आता तब लोग बोल कर सर्च कर लेते हैं । लेकिन मोबाइल तो चला ही लेंगे,
इतने
पर भी हम ठहर जाते तो शुक्र था । अरे 2 साल का बच्चा भी अपना कंटेन्ट जानता है कि
उसे क्या देखना है । वह भले किसी एप्लिकेशन का नाम न जानते हो । यह जो छू कर उसने भी
इस दुनिया का दरवाजा खोल लिया है, उसे वापस
बंद करना किसी के बस का नहीं है । खाना खाना है तब मोबाइल देखना है । ओन है तो देखना
है । देखना है तो रोना है । वह इस छोटी सी उम्र में भी मोबाइल का ‘एडिक्ट’ है ।
ऐसा
नहीं है कि ये हमें सिर्फ बेकार की बातें ही सिखाते हैं । ऐसे Platforms के माध्यम से हमें हमारे काम की
बातें भी बहुत आसानी से पता चल जाती हैं । बहुत सारे अच्छे वीडियो भी होते हैं जो
हमारे काम के होते हैं हमें अच्छी जानकारी भी आसानी से मिल जाती है । लेकिन उससे कहीं
ज़्यादा मात्र में, उतनी ही ज्यादा यहाँ बेकार के कंटेन्ट
होते हैं । जिसमें कोई नाच रहा है, कोई अपने घर की प्राइवेसी दिखाने में लगा है, कोई अश्लील कंटेन्ट डाल रहा है । हर कोई अपने-अपने तरीके
से पैसे कमाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है जो वो कर सकता है ।
मैंने
बहुत सारे रील ऐसे देखे, जिसमें
लड़के-लड़कियां सड़कों पर, मेट्रो
में, रेलवे प्लेट फॉर्म पर जगह घेर कर खड़े हैं नाच
रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं । मतलब कोई भी जगह ऐसी नहीं बची, जहाँ रील बनाने के लिए उन्होंने छोड़ी हो । वीडियो बनाने की ऐसी पड़ी है कि
हर जगह नाचना शुरू कर देते हैं । मुझे उनसे कोई आपत्ति नहीं है । ये उनकी अपनी
मर्जी हैं जो चाहें करे । लेकिन जब मैं ऐसे रील देखती हूँ तब मेरे मन में ये ख्याल
आता हैं कि जो ऐसे कंटेन्ट बना रहा है, उसमें तो उसकी अपनी
मर्जी है लेकिन उस वीडियो में, उसके पीछे (बैक ग्राउंड में) जो लोग दिख रहे हैं क्या उस वीडियो
में आना उनकी अपनी मर्जी थी या बस वो दूसरे के कमाई का जरिया बने हैं । क्योंकि
शायद जितने लोग इसे वीडियो में होते हैं, उनमें से ज़्यादातर
लोगो की अपनी खुद की मर्जी मुझे नहीं लगता कि होती होगी । उन्हें तो पता भी नहीं
होगा कि वो किसी के वीडियो का हिस्सा बन चुके हैं या फिर तब पता चलता होगा जब वो
खुद अपने ‘फीड’ में किसी दूसरे के
वीडियो में खुद को देखते होंगे कि अरे! ये तो मैं पीछे दिख रहा । कुछ को शायद देख
कर अच्छा भी लगता होगा लेकिन हर किसी को नहीं ।
मैंने
बहुत सारे ऐसे रील भी देखे जहाँ लड़की/लड़का मेट्रो में डांस कर रहे है । वहाँ बहुत सारे लोग है आस-पास कुछ तो
उसकी टीम के ही रहते होंगे लेकिन बहुत सारे ऐसे भी हैं, जो
बेचारे अपना चेहरा ढक रहे होते हैं कि मैं कहीं मैं न दिख जाऊँ लेकिन वो फिर भी आ
तो जाते ही हैं । क्या उनकी अपनी कोई प्राइवेसी नहीं होती है पता नहीं ।
हमारा
समाज कितना आगे निकल चुका है तभी तो आज लोग पैसे कमाने और फेमस होने के नाम पर कुछ
भी करने को तैयार हैं चाहे वो सड़कों पर नाचना ही क्यों न हो । अब आप ये नहीं
कहिएगा कि तुम्हें क्या ? न ना ।
मुझे कोई दिक्कत नहीं । क्योंकि ऐसा करने के लिए भी हिम्मत चाहिए । बस मैं इतना
कहना चाहती हूँ कि आज हमारे देश के बहुत सारे युवा पढ़ाई-लिखाई छोड़कर ये शॉर्ट-कट
रास्ता अपनाना ज्यादा पसंद करते हैं । क्योंकि उन्हें लगता है कि सोशल मीडिया उनकी
ज़िंदगी बना सकती है । शायद ऐसा इसलिए भी हो की हमारे देश में बेरोजगारी खत्म होने
का नाम नहीं ले रही । इसीलिए बेचारे जो कुछ नहीं कर पा रहे वो मोबाइल-कैमरा-एक्शन
करने में लगे हैं ।
कुछ
अच्छा काम कर रहे हैं और कुछ अपनी मानसिकता दिखा रहें हैं । जैसे मैं यह लिखकर कि
लोग सड़कों पर नाच कैसे सकते हैं पैसे कमाने के लिए ? क्योंकि एक समय था, जब बंदर नाचता था, मदारी के हाथों गुलाम होकर और आज हमारे देश के युवा नाच रहे हैं सोशल
मीडिया के गुलाम बन कर ।
यह सोशल-मीडिया हमें नचा रहा है । उसके अर्थ मेरे देखते देखते, मेरे सामने ही बदल गए । तभी तो मुझे भी पता नहीं चलता, मैं भी घंटों लगी रहती हूँ मोबाइल की स्क्रीन में डूबी हुई । अँगूठे ने भी क्या नाच नचा रखा है सबको ।
आज के लिए मुझे लगता है, इतना काफी है । एक दो बातें ठीक से आ गयी होंगी । लिखने का मन तो बहुत कुछ है लेकिन सोच रही कहीं किसी को बुरा ना लग जाए पहले इतना देखते हैं आगे की बातें आगे के ब्लॉग में । अगर इसमें मेरी बैंड न बजी तो ह ह ह ह!